राज्य में सच्ची महानता: दीनता, क्षमा और कलीसिया की देखभाल। यीशु सिखाते हैं कि परमेश्वर के राज्य में बड़ा बनने के लिए छोटे बच्चे जैसी दीनता चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि जो विश्वासियों को पाप में गिराता है उसके लिए भयानक सजा है। परमेश्वर हर भटकी हुई भेड़ को ढूंढता है क्योंकि हर एक व्यक्ति उसके लिए कीमती है। यीशु बताते हैं कि जब कोई भाई पाप करे तो उसे प्रेम से वापस लाने के लिए क्या करना चाहिए। निर्दयी नौकर का दृष्टांत दिखाता है कि जिसे परमेश्वर ने माफ किया है उसे दूसरों को भी दिल से माफ करना चाहिए। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कलीसिया में दीनता, प्रेम और माफी कैसे दिखाएं।
ऐतिहासिक संदर्भ
मत्ती 18 यीशु के चेलों को राज्य के जीवन के बारे में सिखाने वाला चौथा बड़ा उपदेश है। यह कफरनहूम में दिया गया जब चेले पूछते हैं कि राज्य में सबसे बड़ा कौन है। यीशु तीन मुख्य बातें सिखाते हैं: राज्य में प्रवेश के लिए दीनता जरूरी है, परमेश्वर हर खोए हुए को ढूंढता है, और विश्वासियों को एक दूसरे को माफ करना चाहिए। यह शिक्षा कलीसिया के जीवन की नींव रखती है।
पवित्रशास्त्र का अंश
मत्ती 18:1-35
व्याख्या और अंतर्दृष्टि
राज्य में प्रवेश: बच्चे जैसी दीनता और छोटों की देखभाल
जब चेले पूछते हैं कि स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है, तो यीशु एक छोटे बच्चे को बुलाकर उनके बीच खड़ा करते हैं और कहते हैं कि जब तक तुम बदलकर छोटे बच्चों के समान नहीं बनोगे, तुम राज्य में प्रवेश भी नहीं कर सकते (मत्ती 18:3)। यह बात चेलों के लिए चौंकाने वाली थी क्योंकि वे बड़प्पन की बात कर रहे थे, लेकिन यीशु कहते हैं कि पहले राज्य में आना जरूरी है। बच्चे जैसा बनने का मतलब है अपनी कमजोरी को मानना, अपने आप पर भरोसा छोड़ना, और पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर रहना। यह दीनता ही राज्य में प्रवेश का दरवाजा है, और जो सबसे ज्यादा दीन है वही सबसे बड़ा है (मत्ती 18:4)। फिर यीशु कहते हैं कि जो कोई एक छोटे बच्चे को उनके नाम से स्वीकार करता है, वह उन्हें स्वीकार करता है (मत्ती 18:5)। इसका मतलब है कि परमेश्वर के राज्य में कमजोर और छोटे लोगों की देखभाल करना बहुत जरूरी है। लेकिन यीशु फिर बहुत कठोर चेतावनी देते हैं: जो कोई इन छोटे विश्वासियों में से किसी को पाप में गिराता है, उसके लिए बेहतर होता कि उसके गले में बड़ी चक्की का पाट लटकाया जाता और वह समुद्र में डुबो दिया जाता (मत्ती 18:6)। यह दिखाता है कि परमेश्वर अपने छोटे बच्चों की कितनी गंभीरता से रक्षा करता है। यीशु यह भी कहते हैं कि अगर तुम्हारा हाथ या पैर तुम्हें पाप में गिराए तो उसे काट डालो, क्योंकि अपंग होकर जीवन में प्रवेश करना बेहतर है बजाय दो हाथ-पैर लेकर नरक की आग में जाने के (मत्ती 18:8-9)। यह कठोर भाषा दिखाती है कि पाप कितना गंभीर है और हमें किसी भी कीमत पर उससे दूर रहना चाहिए।
भटकी भेड़ को ढूंढना और भाई को माफ करना
यीशु फिर भटकी हुई भेड़ का दृष्टांत देते हैं (मत्ती 18:12-14)। अगर किसी आदमी की सौ भेड़ें हैं और एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानबे को छोड़कर उस एक को नहीं ढूंढेगा? जब वह उसे पा लेता है तो वह उस एक के लिए ज्यादा खुश होता है। यीशु कहते हैं कि इसी तरह तुम्हारा स्वर्गीय पिता नहीं चाहता कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो। यह दृष्टांत परमेश्वर के प्रेम और उसकी खोज को दिखाता है - वह हर एक खोए हुए को ढूंढना चाहता है। फिर यीशु सिखाते हैं कि अगर तुम्हारा भाई पाप करे तो उसे अकेले में समझाओ, अगर वह न माने तो एक-दो और लोगों को साथ लेकर जाओ, अगर फिर भी न माने तो कलीसिया को बताओ, और अगर वह कलीसिया की भी न सुने तो उसे अविश्वासी के समान मानो (मत्ती 18:15-17)। यह प्रक्रिया दिखाती है कि कलीसिया में अनुशासन प्रेम से होना चाहिए, लक्ष्य भाई को वापस लाना है, न कि उसे दंड देना। यीशु कहते हैं कि जो कुछ तुम पृथ्वी पर बांधोगे वह स्वर्ग में बंधेगा, और जो खोलोगे वह स्वर्ग में खुलेगा (मत्ती 18:18)। यह अधिकार कलीसिया को दिया गया है कि वह पाप को पहचाने और माफी की घोषणा करे। फिर पतरस पूछता है कि मैं अपने भाई को कितनी बार माफ करूं - क्या सात बार? यीशु कहते हैं, सात बार नहीं बल्कि सत्तर गुणा सात बार (मत्ती 18:21-22)। इसका मतलब है कि माफी की कोई सीमा नहीं है। फिर यीशु निर्दयी नौकर का दृष्टांत देते हैं जिसे राजा ने करोड़ों रुपये का कर्ज माफ कर दिया, लेकिन वह अपने साथी नौकर का छोटा सा कर्ज माफ नहीं करता (मत्ती 18:23-34)। जब राजा को पता चलता है तो वह उसे जेल में डाल देता है। यीशु कहते हैं कि अगर तुम अपने भाइयों को दिल से माफ नहीं करोगे तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा (मत्ती 18:35)। यह दृष्टांत दिखाता है कि जिसे परमेश्वर ने इतना बड़ा पाप माफ किया है, उसे दूसरों को भी माफ करना चाहिए।
अपने घर और रिश्तों में दीनता कैसे दिखाएं
यीशु की यह शिक्षा सबसे पहले तुम्हारे घर में लागू होती है। जब तुम्हारे परिवार में कोई छोटा सा झगड़ा हो, तो पहले माफी मांगने की हिम्मत करो — भले ही तुम सही हो। अपने बच्चों या छोटे भाई-बहनों की बात ध्यान से सुनो, उन्हें यह महसूस कराओ कि वे अहम हैं। अपने पति या पत्नी की सेवा करो बिना यह सोचे कि 'मैं बड़ा हूं'। दफ्तर में जब कोई तुम्हारी इज्जत न करे, तो गुस्सा करने की जगह प्रार्थना करो और प्रेम से पेश आओ। कलीसिया में छोटे-छोटे काम करने से मत शरमाओ — कुर्सियां लगाना, सफाई करना, नए लोगों का स्वागत करना। यह सब करते हुए याद रखो: परमेश्वर की नजर में सच्ची बड़ाई यही है। तुम्हारा दिल जितना नरम और दीन होगा, परमेश्वर तुम्हें उतना ही ऊंचा उठाएगा।
इस हफ्ते तुम क्या करोगे
इस हफ्ते तीन काम जरूर करो। पहला, किसी एक इंसान को माफ करो जिसने तुम्हें दुख दिया है — उसे फोन करो या मिलो, और दिल से कहो 'मैं तुम्हें माफ करता हूं'। दूसरा, हर रोज सुबह प्रार्थना में परमेश्वर से मांगो कि वह तुम्हें दीन बनाए, और शाम को सोचो कि दिन भर तुमने कहां घमंड किया। तीसरा, अपनी कलीसिया में किसी एक नए या अकेले व्यक्ति से दोस्ती करो — उसे खाने पर बुलाओ या बस उसकी बात सुनो। जब कोई तुम्हारी बुराई करे, तो बदला लेने की जगह उसके लिए प्रार्थना करो। जब तुम गलती करो, तो छिपाने की कोशिश मत करो — खुलकर मान लो और परमेश्वर से मदद मांगो। यह आसान नहीं है, लेकिन पवित्र आत्मा तुम्हें ताकत देगा। याद रखो, यीशु ने खुद सूली पर चढ़कर दीनता का सबसे बड़ा नमूना दिखाया — अब तुम उनके पीछे चलो।
- दीनता परमेश्वर के राज्य में प्रवेश और बड़ाई पाने की कुंजी है।
- विश्वासियों को ठोकर खिलाना परमेश्वर के क्रोध को भड़काता है, इससे बचना जरूरी है।
- परमेश्वर हर एक व्यक्ति को बहुमूल्य मानता है और उसे बचाने के लिए सब कुछ करता है।
- कलीसिया में अनुशासन प्रेम से होना चाहिए, ताकि पापी वापस आ सके और एकता बनी रहे।
चिंतन के प्रश्न
- क्या तुम अपने आप को दूसरों से बेहतर समझते हो, या तुम सच में दीन हो?
- तुम्हारी जिंदगी में कौन सा इंसान है जिसे तुम्हें माफ करना चाहिए?
- क्या तुम छोटे-छोटे कामों में खुशी से सेवा करते हो, या सिर्फ बड़े काम चाहते हो?
- जब कोई तुम्हारी बेइज्जती करे, तो तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है?
- तुम अपनी कलीसिया में कमजोर या नए विश्वासियों की कैसे देखभाल कर सकते हो?
- क्या तुम्हारे रिश्तों में दीनता और क्षमा दिखाई देती है?
- परमेश्वर तुम्हें किस एक बात में बदलना चाहता है?
प्रार्थना के बिंदु
हे प्रभु यीशु, मैं तुम्हारे सामने दीनता से आता हूं और मानता हूं कि मेरे दिल में अक्सर घमंड और अहंकार रहता है। तुमने मुझे सिखाया कि सच्ची बड़ाई दीनता में है, लेकिन मैं बार-बार खुद को दूसरों से बेहतर समझता हूं। मुझे माफ करो, प्रभु। मेरे दिल को नरम बनाओ और मुझे छोटे बच्चे जैसी दीनता दो। मुझे उन लोगों को माफ करने की ताकत दो जिन्होंने मुझे दुख दिया है, जैसे तुमने सूली पर अपने दुश्मनों को माफ किया। मेरी कलीसिया में एकता लाओ और हमें एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करना सिखाओ। मुझे अपने घर, दफ्तर और हर जगह तुम्हारे जैसा बनने में मदद करो। पवित्र आत्मा, मुझे रोज बदलते रहो ताकि मैं यीशु की तरह जी सकूं। यीशु मसीह के नाम से, आमेन।
संबंधित वचन
- फिलिप्पियों 2:3-8
- याकूब 4:6-10
- 1 पतरस 5:5-7
- कुलुस्सियों 3:12-14
- इफिसियों 4:31-32
- रोमियों 12:16-18
- गलातियों 6:1-2