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यीशु के दृष्टान्त

दुष्ट किसानों का दृष्टान्त

Disciplefy Team·8 जून 2026·7 मिनट पढ़ें

दुष्ट किसानों का दृष्टान्त हमें दिखाता है कि परमेश्वर ने अपने लोगों को बार-बार मौका दिया, पर उन्होंने उसके दासों को और अंत में उसके बेटे को भी मार डाला। यह दृष्टान्त इस्राएल के अगुवों की कहानी है जिन्होंने परमेश्वर के भेजे हुए भविष्यवक्ताओं को ठुकराया और यीशु को क्रूस पर चढ़ाया। इस अध्ययन में हम सीखेंगे कि परमेश्वर का धैर्य असीमित नहीं है और उसका न्याय निश्चित है। हम यह भी देखेंगे कि जिन्होंने यीशु को ठुकराया, उनसे राज्य लेकर परमेश्वर ने उन लोगों को दिया जो विश्वास से उसे अपनाते हैं। यह दृष्टान्त हमें चेतावनी देता है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह को हल्के में न लें और उसके बेटे यीशु मसीह को पूरे दिल से स्वीकार करें।

ऐतिहासिक संदर्भ

यीशु ने यह दृष्टान्त यरूशलेम में मंदिर के अगुवों और फरीसियों को सुनाया। यह उसके सूली पर चढ़ाए जाने से कुछ दिन पहले की बात है। धार्मिक अगुवे यीशु के अधिकार पर सवाल उठा रहे थे। यीशु ने यह कहानी इसलिए सुनाई ताकि वे समझ सकें कि वे परमेश्वर की योजना को कैसे ठुकरा रहे हैं और इसका क्या परिणाम होगा।

पवित्रशास्त्र का अंश

मत्ती 21:33-46

व्याख्या और अंतर्दृष्टि

अंगूर के बाग का मालिक और दुष्ट किसान

यीशु ने एक बाग के मालिक की कहानी सुनाई जिसने अपने बाग को किसानों को किराए पर दे दिया और दूसरे देश चला गया। जब फसल का समय आया, तो मालिक ने अपने दासों को भेजा ताकि वे उसका हिस्सा ले आएं। पर किसानों ने उन दासों को पकड़ लिया — किसी को पीटा, किसी को मार डाला, किसी पर पत्थर फेंके। मालिक ने फिर और दास भेजे, पर किसानों ने उनके साथ भी वैसा ही किया। आखिर में मालिक ने सोचा, "मैं अपने बेटे को भेजूंगा, वे उसका तो आदर करेंगे।" पर जब किसानों ने बेटे को देखा, तो उन्होंने कहा, "यह तो वारिस है, आओ इसे मार डालें और इसकी मीरास हमारी हो जाएगी।" उन्होंने बेटे को बाग के बाहर निकालकर मार डाला। यह दृष्टान्त इस्राएल के इतिहास की सच्ची तस्वीर है — परमेश्वर ने बार-बार भविष्यवक्ताओं को भेजा (यशायाह, यिर्मयाह, जकर्याह), पर लोगों ने उन्हें मारा और ठुकराया। अंत में परमेश्वर ने अपने बेटे यीशु को भेजा, और धार्मिक अगुवों ने उसे यरूशलेम के बाहर क्रूस पर चढ़ा दिया। यह दृष्टान्त सिर्फ एक कहानी नहीं है — यह परमेश्वर के धैर्य और मनुष्य के विद्रोह की सच्चाई है।

परमेश्वर का न्याय और नया राज्य

यीशु ने फरीसियों से पूछा, "जब बाग का मालिक आएगा, तो वह उन किसानों के साथ क्या करेगा?" उन्होंने खुद ही जवाब दिया, "वह उन दुष्टों को बुरी तरह नष्ट करेगा और बाग दूसरे किसानों को दे देगा जो समय पर फल देंगे।" यीशु ने फिर भजन संहिता 118:22-23 से कहा, "जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने निकाल दिया, वही कोने का सिरा हो गया।" यह पत्थर यीशु है — जिसे धार्मिक अगुवों ने ठुकराया, वही परमेश्वर के राज्य की नींव बन गया। यह दृष्टान्त हमें दिखाता है कि परमेश्वर का राज्य अब सिर्फ इस्राएल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सभी जातियों के लिए खुल गया है जो यीशु पर विश्वास करते हैं (मत्ती 28:19, प्रेरितों के काम 1:8)। जो लोग यीशु को ठुकराते हैं, वे परमेश्वर के न्याय के अधीन आएंगे, पर जो उसे स्वीकार करते हैं, वे राज्य के वारिस बनते हैं। यह दृष्टान्त हमें चेतावनी देता है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह को हल्के में न लें — उसने अपने बेटे को दिया, और अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे पूरे दिल से अपनाएं और उसके लिए फल लाएं। रोमियों 11:17-24 में पौलुस ने यही बात कही है — जो शाखाएं काट दी गईं, उनकी जगह नई शाखाएं जोड़ी गईं, पर हमें घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि विश्वास में बने रहना चाहिए।

अपनी जिम्मेदारी को पहचानो

परमेश्वर ने तुम्हें जो कुछ दिया है — तुम्हारा परिवार, तुम्हारी नौकरी, तुम्हारी सेवकाई, तुम्हारे पैसे — यह सब उसका है, तुम सिर्फ देखभाल करने वाले हो। जब तुम अपने घर में रहते हो, तो याद रखो कि यह परमेश्वर का घर है और तुम्हें इसे उसके लिए इस्तेमाल करना है। अगर तुम्हारे पास कोई हुनर है — गाना, पढ़ाना, बनाना — तो यह परमेश्वर की देन है, इसे अपनी महिमा के लिए नहीं बल्कि उसकी महिमा के लिए इस्तेमाल करो। जब तुम अपने बच्चों को पालते हो, तो समझो कि वे परमेश्वर के हैं और तुम्हें उन्हें उसके तरीके से बड़ा करना है। अगर तुम कलीसिया में कोई काम करते हो, तो यह सोचकर मत करो कि लोग तुम्हारी तारीफ करें, बल्कि यह सोचो कि परमेश्वर खुश हो। जब तुम्हारे पास पैसा आता है, तो पहले सोचो — परमेश्वर इसे कहाँ इस्तेमाल करना चाहता है? यह सब उसका है, तुम सिर्फ मैनेजर हो।

इस हफ्ते ठोस कदम उठाओ

इस हफ्ते एक काम करो — अपनी जिंदगी की एक चीज़ को परमेश्वर के हाथ में सौंप दो जिसे तुम अपना मानते थे। शायद तुम अपनी नौकरी को अपनी मेहनत का नतीजा मानते हो, तो परमेश्वर से कहो, "यह तुम्हारी है, मुझे दिखाओ कि इसे कैसे इस्तेमाल करूं।" अगर तुम अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हो, तो उन्हें परमेश्वर को सौंप दो और उस पर भरोसा करो। इस हफ्ते रोज़ सुबह प्रार्थना में पूछो, "प्रभु, आज मैं तुम्हारे अंगूर के बाग में क्या फल दे सकता हूं?" जब कोई तुम्हें परमेश्वर के बारे में बताने का मौका दे, तो चुप मत रहो — याद करो कि वह तुम्हें अपना गवाह बनाकर भेजता है। अगर तुमने किसी से गलत किया है, तो इस हफ्ते जाकर माफी मांगो — यह दिखाओ कि तुम परमेश्वर के राज्य के नागरिक हो। और सबसे ज़रूरी — यीशु को अपनी जिंदगी का मालिक मानो, सिर्फ मुंह से नहीं बल्कि अपने कामों से।

चिंतन के प्रश्न

  1. क्या मैं अपनी जिंदगी को परमेश्वर की संपत्ति मानता हूं या अपनी मिल्कियत?
  2. जब परमेश्वर मुझसे फल मांगता है, तो मैं उसे क्या देता हूं — बहाने या आज्ञाकारिता?
  3. क्या मैं उन लोगों को अनदेखा करता हूं जो मुझे परमेश्वर की बात याद दिलाते हैं?
  4. यीशु मेरी जिंदगी में कोने का पत्थर है या सिर्फ एक अच्छा शिक्षक?
  5. मैं किन क्षेत्रों में परमेश्वर की जगह खुद को मालिक बना बैठा हूं?
  6. क्या मैं परमेश्वर के राज्य को फैलाने में सक्रिय हूं या सिर्फ अपने फायदे के लिए जीता हूं?
  7. जब परमेश्वर मुझे जिम्मेदारी देता है, तो मैं उसे कैसे निभाता हूं?

प्रार्थना के बिंदु

हे प्रभु परमेश्वर, मैं स्वीकार करता हूं कि मेरी जिंदगी की हर चीज़ तुम्हारी है — मेरा परिवार, मेरा काम, मेरा समय, मेरी सेवकाई, सब कुछ। मुझे माफ करो कि मैंने कई बार इन चीज़ों को अपना माना और तुम्हारी बात नहीं सुनी। प्रभु, मुझे एक वफादार किसान बनाओ जो तुम्हारे अंगूर के बाग में अच्छा फल लाए। जब तू मुझसे कुछ मांगे, तो मैं बहाने न बनाऊं बल्कि खुशी से दूं। हे यीशु, तू मेरी जिंदगी का कोने का पत्थर है — मेरी नींव, मेरा उद्धारकर्ता, मेरा मालिक। मुझे ताकत दे कि मैं तुझे सिर्फ मुंह से नहीं बल्कि अपने कामों से भी स्वीकार करूं। इस हफ्ते मुझे दिखा कि मैं तुम्हारे राज्य को कैसे फैला सकता हूं और दूसरों को तेरे पास ला सकता हूं। यीशु मसीह के नाम से, आमेन।

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