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रोमियों: सुसमाचार का प्रकाशन

रोमियों 13: अधिकारियों का आदर और प्रेम का ऋण

Disciplefy Team·8 अप्रैल 2026·5 मिनट पढ़ें

अधिकारियों का आदर और प्रेम का ऋण — यह अध्ययन हमें सिखाता है कि परमेश्वर ने सरकारी अधिकारियों को स्थापित किया है और हमें उनका आदर करना चाहिए। पौलुस समझाता है कि हर शासक परमेश्वर की योजना का हिस्सा है, इसलिए उनकी आज्ञा मानना परमेश्वर की आज्ञा मानना है। हम सीखेंगे कि कैसे एक मसीही होने के नाते हमें समाज में जिम्मेदार नागरिक बनना है। साथ ही, पौलुस हमें याद दिलाता है कि हम पर किसी का कोई ऋण न हो, सिवाय एक दूसरे से प्रेम करने के। यह अध्ययन हमें दिखाएगा कि प्रेम ही सारी व्यवस्था को पूरा करता है और कैसे हम रोज की जिंदगी में इसे जी सकते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ

पौलुस ने रोमियों की कलीसिया को यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में लिखा था। रोम में मसीही लोग रोमी साम्राज्य के अधीन रहते थे, जहां कभी-कभी अधिकारी उन पर अत्याचार करते थे। पौलुस उन्हें सिखाता है कि कैसे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास रखते हुए समाज में रहें और एक दूसरे से प्रेम करें।

पवित्रशास्त्र का अंश

रोमियों 13:1-14

व्याख्या और अंतर्दृष्टि

रोमियों 13 में पौलुस दो महत्वपूर्ण विषयों पर बात करता है — सरकारी अधिकारियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी और एक दूसरे से प्रेम करने का ऋण। पहले, पौलुस कहता है कि हर व्यक्ति शासन करने वाले अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार परमेश्वर की ओर से बिना नहीं है (रोमियों 13:1)। यह बात बहुत गहरी है — इसका मतलब है कि परमेश्वर अपनी संप्रभुता में हर शासक को स्थापित करता है, चाहे वे अच्छे हों या बुरे। दानिय्येल 2:21 में भी लिखा है कि परमेश्वर ही राजाओं को हटाता और स्थापित करता है। पौलुस समझाता है कि जो अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की व्यवस्था का विरोध करता है (रोमियों 13:2)। अधिकारी परमेश्वर के सेवक हैं जो भलाई के लिए काम करते हैं और बुराई को दंड देते हैं (रोमियों 13:3-4)। इसलिए हमें न केवल दंड के डर से, बल्कि विवेक के कारण भी उनकी आज्ञा माननी चाहिए। पौलुस यह भी कहता है कि हमें कर और महसूल देना चाहिए, और जिसका जो हक है वह देना चाहिए — आदर और इज्जत (रोमियों 13:7)। यह सब इसलिए क्योंकि परमेश्वर ने समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार को स्थापित किया है।

दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत जो पौलुस सिखाता है वह है प्रेम का ऋण। वह कहता है, 'आपस में प्रेम करने के सिवाय किसी के कर्जदार न रहो' (रोमियों 13:8)। यह एक ऐसा ऋण है जो कभी खत्म नहीं होता — हमें हमेशा एक दूसरे से प्रेम करते रहना है। पौलुस समझाता है कि जो दूसरे से प्रेम करता है, उसने व्यवस्था पूरी कर दी (रोमियों 13:8)। फिर वह दस आज्ञाओं में से कुछ को गिनाता है — व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, लालच मत करो — और कहता है कि ये सब और कोई भी आज्ञा इस एक बात में समा जाती है: 'अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो' (रोमियों 13:9)। यीशु ने भी मत्ती 22:37-40 में कहा था कि सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं का सार परमेश्वर से प्रेम और पड़ोसी से प्रेम में है। पौलुस आगे कहता है कि प्रेम पड़ोसी की बुराई नहीं करता, इसलिए प्रेम व्यवस्था को पूरा करना है (रोमियों 13:10)। यह सिद्धांत हमें दिखाता है कि मसीही जीवन केवल नियमों का पालन नहीं है, बल्कि प्रेम से भरा जीवन है। जब हम सच्चे दिल से दूसरों से प्रेम करते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से उनकी भलाई चाहते हैं और उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते। यह प्रेम पवित्र आत्मा का फल है (गलातियों 5:22) और यह हमारे जीवन में मसीह की उपस्थिति का प्रमाण है।

चिंतन के प्रश्न

  1. क्या आप सरकारी अधिकारियों को परमेश्वर की योजना का हिस्सा मानते हैं?
  2. जब कोई अधिकारी गलत फैसला लेता है, तो आप कैसे प्रतिक्रिया देते हैं?
  3. क्या आप अपने देश के नेताओं के लिए नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं?
  4. आप अपने बच्चों या दोस्तों को अधिकारियों का आदर करना कैसे सिखा सकते हैं?
  5. क्या आपने कभी किसी अधिकारी के साथ बेइज्जती से बात की है? क्या आपको माफी मांगनी चाहिए?
  6. जब दूसरे लोग सरकार को कोसते हैं, तो आप क्या करते हैं?
  7. आप इस हफ्ते किस एक तरीके से अधिकारियों का आदर दिखा सकते हैं?

प्रार्थना के बिंदु

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