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रोमियों: सुसमाचार का प्रकाशन

रोमियों 14: एक दूसरे को स्वीकार करना

Disciplefy Team·9 अप्रैल 2026·5 मिनट पढ़ें

एक दूसरे को स्वीकार करना — यह अध्ययन सिखाता है कि कलीसिया में अलग-अलग विश्वास वाले लोगों को कैसे प्रेम से रहना चाहिए। रोमियों 14 में पौलुस बताता है कि छोटे-छोटे मुद्दों पर झगड़ना गलत है — जैसे खाने-पीने के नियम या खास दिन मानना। कुछ विश्वासी विश्वास में मजबूत हैं, कुछ कमजोर — लेकिन दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। हम सब परमेश्वर के सामने जवाबदेह हैं, इसलिए दूसरों को जज करना हमारा काम नहीं। यह अध्ययन आपको सिखाएगा कि कैसे प्रेम और स्वीकार करने की भावना से कलीसिया में एकता बनाए रखें।

ऐतिहासिक संदर्भ

पौलुस ने रोम की कलीसिया को यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में लिखा। रोम में यहूदी और गैर-यहूदी दोनों विश्वासी थे। उनके बीच खाने-पीने के नियमों और खास दिनों को लेकर मतभेद थे। पौलुस इस अध्याय में सिखाता है कि छोटे मुद्दों पर एकता कैसे बनाए रखें।

पवित्रशास्त्र का अंश

रोमियों 14:1-23

व्याख्या और अंतर्दृष्टि

रोमियों 14 में पौलुस एक बहुत जरूरी सवाल का जवाब देता है — जब विश्वासियों के बीच छोटे-छोटे मुद्दों पर मतभेद हो, तो क्या करें? पद 1 में वह कहता है, 'जो विश्वास में कमजोर है, उसे अपनाओ, पर उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए नहीं।' यहां 'कमजोर' का मतलब है वह व्यक्ति जो अभी भी पुराने नियमों से बंधा है — जैसे कुछ खाना न खाना या खास दिन मानना। 'मजबूत' वह है जो समझता है कि मसीह में हम इन नियमों से आजाद हैं। लेकिन पौलुस दोनों को एक दूसरे को स्वीकार करने की आज्ञा देता है। पद 3 में वह कहता है, 'जो खाता है वह उसे तुच्छ न जाने जो नहीं खाता, और जो नहीं खाता वह उस पर दोष न लगाए जो खाता है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है।' यह बात बहुत गहरी है — अगर परमेश्वर ने किसी को स्वीकार किया है, तो हम कौन होते हैं उसे अस्वीकार करने वाले? पद 4 में पौलुस पूछता है, 'तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है?' हर विश्वासी परमेश्वर का सेवक है, और वही उसका न्यायी है। पद 10-12 में पौलुस याद दिलाता है कि हम सब मसीह के न्याय आसन के सामने खड़े होंगे — इसलिए एक दूसरे को जज करना बंद करो और अपने आप को जांचो।

इस अध्याय से तीन बड़े सिद्धांत निकलते हैं। पहला, प्रेम नियमों से बड़ा है — पद 15 में पौलुस कहता है, 'यदि तेरे भोजन के कारण तेरा भाई उदास होता है, तो फिर तू प्रेम की रीति से नहीं चलता।' मतलब, अगर तुम्हारी आजादी किसी कमजोर भाई को ठोकर खिलाती है, तो प्रेम में उस आजादी को छोड़ दो। दूसरा, परमेश्वर का राज्य खाने-पीने में नहीं, बल्कि 'धार्मिकता, मेल और पवित्र आत्मा में आनंद' में है (पद 17)। हम छोटी बातों पर लड़कर असली बातें भूल जाते हैं — परमेश्वर चाहता है कि हम पवित्रता, एकता और आत्मिक खुशी में बढ़ें। तीसरा, विवेक का सम्मान करो — पद 23 कहता है, 'जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है।' अगर कोई विश्वासी किसी बात को गलत मानता है और फिर भी करता है, तो वह पाप करता है। इसलिए हमें एक दूसरे के विवेक का सम्मान करना चाहिए। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कलीसिया में एकता बनाए रखने के लिए प्रेम, धैर्य और विनम्रता जरूरी है — न कि अपनी राय दूसरों पर थोपना।

चिंतन के प्रश्न

  1. क्या आप किसी विश्वासी को छोटे मुद्दों पर जज कर रहे हैं?
  2. आपके जीवन में कौन सी बातें परमेश्वर के राज्य की हैं और कौन सी सिर्फ आपकी राय हैं?
  3. जब कोई आपसे अलग तरीके से परमेश्वर की सेवा करता है, तो आप कैसा महसूस करते हैं?
  4. क्या आप अपनी कलीसिया में एकता लाने के लिए कुछ कर रहे हैं?
  5. आप इस हफ्ते किस एक व्यक्ति को स्वीकार करने का फैसला करेंगे?
  6. क्या आपकी जिंदगी में प्रेम और शांति दिखाई देती है या सिर्फ नियम और बहस?
  7. परमेश्वर आपसे क्या बदलाव चाहता है ताकि आप दूसरों को बेहतर तरीके से स्वीकार कर सकें?

प्रार्थना के बिंदु

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