एक दूसरे को स्वीकार करना — यह अध्ययन सिखाता है कि कलीसिया में अलग-अलग विश्वास वाले लोगों को कैसे प्रेम से रहना चाहिए। रोमियों 14 में पौलुस बताता है कि छोटे-छोटे मुद्दों पर झगड़ना गलत है — जैसे खाने-पीने के नियम या खास दिन मानना। कुछ विश्वासी विश्वास में मजबूत हैं, कुछ कमजोर — लेकिन दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। हम सब परमेश्वर के सामने जवाबदेह हैं, इसलिए दूसरों को जज करना हमारा काम नहीं। यह अध्ययन आपको सिखाएगा कि कैसे प्रेम और स्वीकार करने की भावना से कलीसिया में एकता बनाए रखें।
ऐतिहासिक संदर्भ
पौलुस ने रोम की कलीसिया को यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में लिखा। रोम में यहूदी और गैर-यहूदी दोनों विश्वासी थे। उनके बीच खाने-पीने के नियमों और खास दिनों को लेकर मतभेद थे। पौलुस इस अध्याय में सिखाता है कि छोटे मुद्दों पर एकता कैसे बनाए रखें।
पवित्रशास्त्र का अंश
रोमियों 14:1-23
व्याख्या और अंतर्दृष्टि
रोमियों 14 में पौलुस एक बहुत जरूरी सवाल का जवाब देता है — जब विश्वासियों के बीच छोटे-छोटे मुद्दों पर मतभेद हो, तो क्या करें? पद 1 में वह कहता है, 'जो विश्वास में कमजोर है, उसे अपनाओ, पर उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए नहीं।' यहां 'कमजोर' का मतलब है वह व्यक्ति जो अभी भी पुराने नियमों से बंधा है — जैसे कुछ खाना न खाना या खास दिन मानना। 'मजबूत' वह है जो समझता है कि मसीह में हम इन नियमों से आजाद हैं। लेकिन पौलुस दोनों को एक दूसरे को स्वीकार करने की आज्ञा देता है। पद 3 में वह कहता है, 'जो खाता है वह उसे तुच्छ न जाने जो नहीं खाता, और जो नहीं खाता वह उस पर दोष न लगाए जो खाता है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है।' यह बात बहुत गहरी है — अगर परमेश्वर ने किसी को स्वीकार किया है, तो हम कौन होते हैं उसे अस्वीकार करने वाले? पद 4 में पौलुस पूछता है, 'तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है?' हर विश्वासी परमेश्वर का सेवक है, और वही उसका न्यायी है। पद 10-12 में पौलुस याद दिलाता है कि हम सब मसीह के न्याय आसन के सामने खड़े होंगे — इसलिए एक दूसरे को जज करना बंद करो और अपने आप को जांचो।
इस अध्याय से तीन बड़े सिद्धांत निकलते हैं। पहला, प्रेम नियमों से बड़ा है — पद 15 में पौलुस कहता है, 'यदि तेरे भोजन के कारण तेरा भाई उदास होता है, तो फिर तू प्रेम की रीति से नहीं चलता।' मतलब, अगर तुम्हारी आजादी किसी कमजोर भाई को ठोकर खिलाती है, तो प्रेम में उस आजादी को छोड़ दो। दूसरा, परमेश्वर का राज्य खाने-पीने में नहीं, बल्कि 'धार्मिकता, मेल और पवित्र आत्मा में आनंद' में है (पद 17)। हम छोटी बातों पर लड़कर असली बातें भूल जाते हैं — परमेश्वर चाहता है कि हम पवित्रता, एकता और आत्मिक खुशी में बढ़ें। तीसरा, विवेक का सम्मान करो — पद 23 कहता है, 'जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है।' अगर कोई विश्वासी किसी बात को गलत मानता है और फिर भी करता है, तो वह पाप करता है। इसलिए हमें एक दूसरे के विवेक का सम्मान करना चाहिए। यह अध्याय हमें सिखाता है कि कलीसिया में एकता बनाए रखने के लिए प्रेम, धैर्य और विनम्रता जरूरी है — न कि अपनी राय दूसरों पर थोपना।
- परमेश्वर ने हर विश्वासी को स्वीकार किया है, इसलिए हमें भी उन्हें स्वीकार करना चाहिए।
- छोटे मुद्दों पर बहस करना परमेश्वर के राज्य की बात नहीं है — प्रेम और शांति ज्यादा जरूरी हैं।
- हर व्यक्ति अपने विश्वास में परमेश्वर के सामने खड़ा होगा, हमारे सामने नहीं।
- मसीह ने हमें स्वीकार किया ताकि हम एक साथ परमेश्वर की महिमा करें, न कि एक दूसरे से लड़ें।
चिंतन के प्रश्न
- क्या आप किसी विश्वासी को छोटे मुद्दों पर जज कर रहे हैं?
- आपके जीवन में कौन सी बातें परमेश्वर के राज्य की हैं और कौन सी सिर्फ आपकी राय हैं?
- जब कोई आपसे अलग तरीके से परमेश्वर की सेवा करता है, तो आप कैसा महसूस करते हैं?
- क्या आप अपनी कलीसिया में एकता लाने के लिए कुछ कर रहे हैं?
- आप इस हफ्ते किस एक व्यक्ति को स्वीकार करने का फैसला करेंगे?
- क्या आपकी जिंदगी में प्रेम और शांति दिखाई देती है या सिर्फ नियम और बहस?
- परमेश्वर आपसे क्या बदलाव चाहता है ताकि आप दूसरों को बेहतर तरीके से स्वीकार कर सकें?
प्रार्थना के बिंदु
- हे प्रभु यीशु, मुझे माफ करो कि मैंने अपने भाइयों-बहनों को छोटे मुद्दों पर जज किया है। मुझे ऐसा दिल दो जो दूसरों को स्वीकार करे और प्रेम से पेश आए। मुझे याद दिलाओ कि तुमने मुझे भी बिना किसी शर्त के स्वीकार किया है।
- हे परमेश्वर, मेरी कलीसिया में एकता लाओ। हमें छोटी-छोटी बातों पर लड़ने से बचाओ। हमें सिखाओ कि कैसे अलग-अलग होते हुए भी एक साथ रहें। हमारे बीच प्रेम और शांति बढ़ाओ ताकि दुनिया देखे कि हम तुम्हारे चेले हैं।
- हे पवित्र आत्मा, मुझे ताकत दो कि मैं अपनी राय को परमेश्वर के राज्य से ज्यादा महत्व न दूं। मुझे सिखाओ कि कैसे धार्मिकता, शांति, और आनंद में जीऊं। मुझे दूसरों की कमजोरियों को सहने की शक्ति दो और उन्हें प्रेम से मजबूत बनाने में मदद करो।
संबंधित वचन
- 1 कुरिन्थियों 8:1-13
- गलातियों 5:13-15
- इफिसियों 4:1-6
- कुलुस्सियों 3:12-17
- याकूब 4:11-12
- 1 पतरस 4:8-11
- फिलिप्पियों 2:1-4
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