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रोमियों: सुसमाचार का प्रकाशन

रोमियों 15: मसीह के मिशन में एकजुट

Disciplefy Team·9 अप्रैल 2026·5 मिनट पढ़ें

मसीह के मिशन में एकजुट होना हमारी बुलाहट है। रोमियों 15 में पौलुस सिखाता है कि यीशु ने यहूदियों और अन्यजातियों दोनों को स्वीकार किया, इसलिए हमें भी एक दूसरे को स्वीकार करना चाहिए। यह अध्याय दिखाता है कि कैसे मसीह की सेवकाई ने सभी लोगों के लिए परमेश्वर की योजना को पूरा किया। हम सीखेंगे कि कलीसिया में एकता कैसे बनाएं और मिलकर सुसमाचार कैसे फैलाएं। यह अध्ययन हमें दिखाएगा कि विश्वासियों के बीच प्रेम और स्वीकृति परमेश्वर की महिमा करती है। हमारी साझा जिम्मेदारी है कि हम एक साथ मिलकर मसीह के मिशन को आगे बढ़ाएं।

ऐतिहासिक संदर्भ

पौलुस ने रोम की कलीसिया को यह पत्र लगभग 57 ईस्वी में लिखा था। रोम में यहूदी और अन्यजाति विश्वासी दोनों थे, और उनके बीच तनाव था। पौलुस इस पत्र के अंत में उन्हें एकता की ओर बुलाता है। वह दिखाता है कि मसीह का मिशन सभी लोगों के लिए था, और हमें भी उसी मिशन में शामिल होना है।

पवित्रशास्त्र का अंश

रोमियों 15:1-13

व्याख्या और अंतर्दृष्टि

रोमियों 15 में पौलुस एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाता है - मजबूत विश्वासियों को कमजोर विश्वासियों की कमजोरियां उठानी चाहिए। यह केवल सहनशीलता नहीं है, बल्कि सक्रिय प्रेम और सेवा है। पौलुस कहता है कि हमें अपने आप को खुश करने के लिए नहीं जीना चाहिए, बल्कि दूसरों की भलाई के लिए जीना चाहिए। यह मसीह का उदाहरण है - उसने अपनी खुशी नहीं खोजी, बल्कि हमारे लिए अपमान और दुख सहा। भजन संहिता 69:9 को उद्धृत करते हुए, पौलुस दिखाता है कि मसीह ने परमेश्वर की महिमा के लिए निंदा सही। पुराने नियम के शास्त्र हमें धीरज और प्रोत्साहन देने के लिए लिखे गए थे, ताकि हम आशा रख सकें। पौलुस प्रार्थना करता है कि धीरज और शांति का परमेश्वर विश्वासियों को एक मन और एक मुंह से उसकी महिमा करने की शक्ति दे। यह एकता केवल मानवीय प्रयास से नहीं आती, बल्कि परमेश्वर की कृपा से आती है जब हम मसीह के उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

पौलुस फिर एक गहरा सिद्धांत सिखाता है - हमें एक दूसरे को वैसे ही स्वीकार करना चाहिए जैसे मसीह ने हमें स्वीकार किया है। यह स्वीकृति परमेश्वर की महिमा के लिए है, न कि केवल मानवीय सद्भावना के लिए। मसीह यहूदियों का सेवक बना ताकि परमेश्वर की सच्चाई प्रकट हो और पूर्वजों से किए गए वादे पूरे हों। लेकिन उसका मिशन यहीं नहीं रुका - अन्यजातियों को भी परमेश्वर की दया के लिए उसकी महिमा करनी थी। पौलुस चार पुराने नियम के पदों को उद्धृत करता है जो दिखाते हैं कि परमेश्वर की योजना हमेशा से सभी जातियों को शामिल करने की थी। भजन संहिता 18:49 में दाऊद कहता है कि वह अन्यजातियों के बीच परमेश्वर की स्तुति करेगा। व्यवस्थाविवरण 32:43 में मूसा अन्यजातियों को इस्राएल के साथ आनंद मनाने के लिए बुलाता है। भजन संहिता 117:1 सभी जातियों को प्रभु की स्तुति करने के लिए कहता है। यशायाह 11:10 यिशै की जड़ की भविष्यवाणी करता है जो अन्यजातियों पर राज्य करेगा और जिस पर वे आशा रखेंगे। ये सभी पद मिलकर दिखाते हैं कि मसीह का मिशन सार्वभौमिक था - सभी लोगों के लिए उद्धार और आशा लाना। पौलुस की प्रार्थना है कि आशा का परमेश्वर विश्वासियों को विश्वास करने में सब प्रकार के आनंद और शांति से भर दे, ताकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से उनकी आशा बढ़ती जाए।

चिंतन के प्रश्न

  1. रोमियों 15 में पौलुस क्यों कहता है कि हमें एक दूसरे को स्वीकार करना चाहिए?
  2. यीशु ने यहूदियों और अन्यजातियों दोनों को कैसे स्वीकार किया?
  3. आपकी जिंदगी में कौन से लोग हैं जिन्हें स्वीकार करना मुश्किल लगता है?
  4. एकता और सच्चाई में संतुलन कैसे बनाया जा सकता है?
  5. आप इस हफ्ते किसी अलग विश्वासी के साथ कैसे जुड़ सकते हैं?
  6. कलीसिया में एकता से परमेश्वर की महिमा कैसे होती है?
  7. क्या आप किसी को माफ करने या स्वीकार करने की जरूरत महसूस करते हैं?

प्रार्थना के बिंदु

संबंधित वचन


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